प्यार तो सिर्फ प्यार है उसकी कोई परिभाषा नहीं है, शायद इसीलिए कहते हैं कि प्यार के मायने वही समझ सकता है जो उसकी गहराईयों में उतकर उसके एक – एक पाठ को पढ़ता है। प्यार जीवन की सच्चाई है जिसे समझने के लिए इसकी गहराईयों तक जाना पड़ता है। यह तो एक समुद्र है जिसे किनारे से देखकर उसकी गहराई का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। प्यार जीवन का हर उमंग है तो गहरी पीढ़ा भी । उमंग, अपने साथी को पाने और उसके साथ खुशनुमा जिंदगी बिताने की, तो पीढ़ा सिर्फ उससे एक – दो पल बिछड़ने की नहीं बल्कि ता उम्र उसकी चाहत में जिंदगी बिताने की। प्यार, खुशनुमा अहसास है संसार की दुश्विारियों और बंधनों से लड़ने के बीच अपने साथी के साथ जिंदगी बिताने का। प्यार, जुनून है अपने साथी की खुशी और उसे पाने के लिए कुछ भी कर जाने का। यह वह बहार है जो वीरान और बंजर जिंदगी में उमंगो और आशाओं के फूल खिला देती है जिसकी खुशबू से उन प्रेमियों की जिंदगी ही नहीं बल्कि पूरी कायनात महक उठती है।
अक्सर लोग आशिकी या अपने सिरफिनरेपन को प्यार समझ बैठते हैं और कुछ ही मुलाकातों में अपना सब कुछ न्योछावर करने से लेकर चांद तारे तोड़कर कदमों में रखने की बातें करते हैं और प्यार ना मिले तो देवदास बने घूमते हैं। लेकिन प्यार तो कुछ और ही है जो ना तो अपने साथी से चांद तारे की ख्वाहिश रखता है और ना ही कुछ पाने की । क्योंकि प्यार कुछ पाना नहीं है, यह तो समर्पण है अपने साथी के प्रति खुद का। फिर ना तो कुछ मेरा होता है और ना तेरा। सच्चे प्रेम में ढूबकर ही प्रेमी दो जिस्म एक जान होते हैं, जिसमें अहं और स्वार्थ की कोई जगह नहीं होती। अहं के होते हुए ना तो प्रेम हो सकता है और ना ही ईश्वर की भक्ति। कबीर दास जी ने कहा है, “जब ‘मैं’ था तब हरि नहीं, अब हरि है ‘मैं’ नाहि। जहां प्रेम होता है वहां ईश्वर भी वास करते हैं। हमारे सूफी संतों ने शायद इसीलिए प्यार को ईश्वर की उपासना के बराबर माना और पूरे संसार में इसका पैगाम दिया।
प्यार सच्चा है तो अपने साथी से विछोह की पीढ़ा, जीवन को अंधकार की ओर नहीं ढकेलती बल्कि उसे प्रेरित करती है कि वह समाज के उत्ताथन के लिए खुद को समर्पित कर दे। ताकि किसी और का प्रेम अधूरा ना रह जाए। अपने साथी से अलग होने की पीढ़ा को झेलता हुए प्रेमी समाज को एक नई दिशा देने में लग जाता है और अटूट मेहनत करता है, इस उम्मीद के साथ कि एक दिन उसका प्यार उसे उसकी इस मेहनत के परिणाम स्वरूप किसी ना किसी रूप में जरूर मिलेगा। इस तरह प्यार का यह पुष्प जो दो दिलों के बीच खिलता है पूरे समाज को सुगंधित करता है और बदलाव की एक नई बयार लाता है।
प्यार में बंदिशें नहीं होती प्यार तो स्वच्छंद है उस परिंदे की तरह जो खुले आकाश में उड़कर वापस वहीं आता है जहां से उड़ा था। अगर किसी से सच में प्यार है तो उसे कसमों और वादों के बंधनों में मत बंधों। साथी के प्रति वफादारी और प्यार पर अटूट विश्वास ही प्यार की दिशा को निर्धारित करता है। प्यार की नींव कसमें और वादे मजबूत नहीं बनाते, उसे मजबूत बनाता विश्वास और एक मजबूत नींव ही आशियाना तैयार करती है। हां,,, वही आशियाना जहां दोनों अपनी जिंदगी के हसीं पल बिताते हैं।
शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011
ये कांग्रेस का ‘हाथ’ नहीं ‘हंटर’ है
महंगाई अपने चरम पर है। कांग्रेस का हाथ अब आम आदमी के सर से फिसल कर उद्योगपतियों और घोटालेबाजों के कंधों पर आ गया। पीएम मनमोहन सिंह अब जनता के सवालों के जवाब देने में भी लाचार नजर आ रहे हैं, और तो और अब वे इसे खुले आम स्वींकार चुके हैं कि महंगाई और भ्रष्टाचार ने उनकी सरकार की छवि को देश ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल किया है। एक प्रधानमंत्री होने के नाते अगर वे जनता की समस्याओं को नहीं समझ सकते तो उन्हें कोई हक नहीं बनता कि वह इस पद पर रहें। सिर्फ गलती स्वीकारने भर से वह अपने कर्तव्य से बच नहीं सकते। ताज्जु्ब की बात तो यह हैं कि एक देश का मुखिया बजाए कि कोई कार्यवाही करने के सिर्फ अपनी सरकार की कमजोरियों को गिना रहा है जबकि उसके पास पूरे अधिकार हैं कि वह इन घोटेलेबाजों को सजा दे। एक ओर जहां वह जनता के सामने अपनी गलतियों की माफी मांग रहे हैं वहीं दूसरी ओर अपराधियों को संरक्षण देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे। जिस मुद्रदे को लेकर कांग्रेस सत्ता में आयी थी वह तो कहीं रह ही नहीं गया। कांग्रेस के जिस हाथ को वह आम आदमी के साथ बात रहे थे अब वह कहां है जब जनता महंगाई के आगे घुटने टेके हुए है।
हमारे देश की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी एक दिन में इतना नहीं कमा पाती की वो भर पेट खाना खा सके। फिर प्रधानमंत्री को उन गरीबों का ध्यान क्यों नहीं आता जो किसी तरह से अपना जीवन यापन कर रहे हैं, ऐसी महंगाई में उनके पास एक ही विकल्प बचता है कि एक दिन ना खाकर दूसरे दिन खा लेंगे क्योंकि जितना वह कमाते हैं उससे वह इस महंगाई में हर दो दिन में एक बार ही खा सकते हैं। कमेटी और कानून बनाने से बेहतर होगा कि सरकार कोई ठोस कदम उठाए जिसका असर तत्काल प्रभाव से नजर आए।
हमारे देश की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी एक दिन में इतना नहीं कमा पाती की वो भर पेट खाना खा सके। फिर प्रधानमंत्री को उन गरीबों का ध्यान क्यों नहीं आता जो किसी तरह से अपना जीवन यापन कर रहे हैं, ऐसी महंगाई में उनके पास एक ही विकल्प बचता है कि एक दिन ना खाकर दूसरे दिन खा लेंगे क्योंकि जितना वह कमाते हैं उससे वह इस महंगाई में हर दो दिन में एक बार ही खा सकते हैं। कमेटी और कानून बनाने से बेहतर होगा कि सरकार कोई ठोस कदम उठाए जिसका असर तत्काल प्रभाव से नजर आए।
मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011
शाहजहांपुर हादसा: अब ये बेरोजगारी जान पर हावी होने लगी
जुगजुग जियो बेटा, सफल होकर आना,,,,यही दुआ दी होंगी हर उस मां ने, जिसने शाहजहांपुर ट्रेन हादसे में अपने सपूत को खो दिया। उस मां को क्या मालूम था कि जिस बेटे की खुशी और उज्जनवल भविष्य के लिए घर से बाहर भेज रही है, वह कभी लौटकर वापस ही नहीं आएगा। बेरोजगारी और अव्यवस्था ने एक बार फिर कई मां-बाप के सपनों को तार-तार कर दिया। बरेली में आईटीबीपी की भर्ती देखने करीब 12 राज्यों के लाखों छात्र एकत्रित हुए थे। ऐसा पहली बार नहीं था जब अपनी बेरोजगारी को दूर करने के लिए इतनी बड़ी संख्या में छात्र अपने-अपने शहरों से दूसरे शहरों में गए हों। खुली भर्ती ही नहीं रेलवे, बैंक और बहुत सी परीक्षाओं के परीक्षा केंद्र अक्सर कुछ गिने-चुने शहरों को बनाया जाता है। जबकि इनमें सम्मिलित होने के लिए देश के हर कोने से छात्र इन शहरों में आते हैं। इन परीक्षाओं से एक से दो दिन पहले स्टेशन से लेकर फुटपाथ तक में खुले आसमां के नीचे इन छात्रों को अपने सुनहरे भविष्य के सपनों को बुनते देखा जा सकता है। दिन-रात का सफर तय करके ये छात्र सिर्फ इस उम्मीद के साथ परीक्षा में सम्मिलित होने आते हैं कि इसमें सफल होकर एक दिन वह अपने मां-बाप का सहारा बनेंगे और देश की सेवा करेंगे। लेकिन इन छात्रों की सुरक्षा की जरूरत ना तो इन भर्ती और परीक्षाओं को आयोजित करने वाली संस्थाओं को महसूस होती है और ना ही सरकार और प्रशासन को। और वह बेबस मां बाप भी क्या करें जो ना चाहते हुए भी अपने जिगर के टुकड़े को खुद से दूर उस भीड़ में जाने देते हैं, जिसमें अपनी संतान को खोने का डर उन्हें तब तक सताता रहता है जब तक वह सही सलामत वापस नहीं आ जाता।
इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का एक शहर से दूसरे शहर में आने-जाने के लिए सरकार भी परिवहन की कोई व्यवस्था नहीं करती। घर लौटन की जल्दी और साधन ना मिलने की वजह से अक्सर छात्र कुछ ऐसा करने को मजबूर हो जाते हैं जो नियम-कानून के खिलाफ होता है। माना कि जवानी के जोश में वे कुछ गलतियां करते हैं जिसका खामियाजा उन्हें इस तरह के हादसों में जान देकर चुकाना पड़ता है लेकिन इसके लिए पूरी तरह उन्हेंं दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अगर वह कुछ गलत कर रहे थे तो बरेली से इतनी दूर का सफर करने के दौरान उन्हें रोका क्यूं नहीं गया। ये काम तो प्रशासन का था। िफर प्रशासन ने अपनी ड्यूटी पूरी क्यों नहीं की। अगर प्रशासन उनके आने-जाने की समुचित व्यवस्था करे तो इस तरह के हादसों को रोका जा सकता है। साथ ही परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाएं जो परीक्षा फीस के नाम पर छात्रों से वसूली करती है, वह उसका प्रयोग सेंटर बढ़ाने में या परीक्षा को कई पारियों में आयोजित कराने में क्यों नहीं करतीं। अगर इस दिशा में जल्द ही कोई कदम नहीं उठाया गया तो शायद एक दिन मां बाप अपने बच्चों को इन परीक्षाओं में भेजने के बजाए घर पर बैठाना ज्यादा उचित समझेंगे। और अगर ऐसा होता है तो जिस देश की प्रतिभा का गुणगान प्रधानमंत्री विदेशों में करने से नहीं चूकते वह अपने ही देश में कहीं ढूंढने पर भी नहीं मिलेगी।
इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का एक शहर से दूसरे शहर में आने-जाने के लिए सरकार भी परिवहन की कोई व्यवस्था नहीं करती। घर लौटन की जल्दी और साधन ना मिलने की वजह से अक्सर छात्र कुछ ऐसा करने को मजबूर हो जाते हैं जो नियम-कानून के खिलाफ होता है। माना कि जवानी के जोश में वे कुछ गलतियां करते हैं जिसका खामियाजा उन्हें इस तरह के हादसों में जान देकर चुकाना पड़ता है लेकिन इसके लिए पूरी तरह उन्हेंं दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अगर वह कुछ गलत कर रहे थे तो बरेली से इतनी दूर का सफर करने के दौरान उन्हें रोका क्यूं नहीं गया। ये काम तो प्रशासन का था। िफर प्रशासन ने अपनी ड्यूटी पूरी क्यों नहीं की। अगर प्रशासन उनके आने-जाने की समुचित व्यवस्था करे तो इस तरह के हादसों को रोका जा सकता है। साथ ही परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाएं जो परीक्षा फीस के नाम पर छात्रों से वसूली करती है, वह उसका प्रयोग सेंटर बढ़ाने में या परीक्षा को कई पारियों में आयोजित कराने में क्यों नहीं करतीं। अगर इस दिशा में जल्द ही कोई कदम नहीं उठाया गया तो शायद एक दिन मां बाप अपने बच्चों को इन परीक्षाओं में भेजने के बजाए घर पर बैठाना ज्यादा उचित समझेंगे। और अगर ऐसा होता है तो जिस देश की प्रतिभा का गुणगान प्रधानमंत्री विदेशों में करने से नहीं चूकते वह अपने ही देश में कहीं ढूंढने पर भी नहीं मिलेगी।
मंगलवार, 25 जनवरी 2011
ये नेता हैं कहीं कुछ नहीं छोड़ते
सोचा था गणतंत्र दिवस की सुबह मेरे विश्वाविद्यालय में होगी लेकिन अफसोस हमेशा देर से चलने वाली रेलगाड़ी समय पर चली गई और मैं झांसी में ही रह गया. लेकिन इसी बहाने मुझे मौका मिला झांसी पुलिस लाइन की परेड में शामिल होने का. परेड तो अच्छी रही लेकिन एक बात जो मुझे थोड़ी अजीब लगी कि दिल्ली हो या कोई छोटा कस्बा इन राष्ट्रीय त्योहारों में बुलाए जाने वाले माननीय नेतागण अपनी राजनीति और नेतानगरी को चमकाना यहां भी नहीं भूलते. भाषण के दौरान नेता जी ने अंबेडकर से लेकर मायावती की पूरी योजनाएं जो हैं या नहीं हैं सभी का गुणगान कर डाला. लेकिन बेचार जहां पर आकड़ों की बारी आती उनकी जबान अटक जाती लगता है नेता जी की गणित कमजोर थी, तभी नेता बन गए कितने अंदर कितने बारह इसका कोई अंदाजा ही ना लगे. खैर गणतंत्र दिवस की हार्दिक सुभकामनाएं
बुधवार, 29 दिसंबर 2010
आजादी विचारों की,,,
आज बहुत दिन बाद इस ब्लॉग के दिन बहुरेंगे, लगभग एक साल के बाद आज इसमें कोई ब्लॉग पोस्ट होगा। ख्याल तो बहुत आते रहे लेकिन उन्हें यहां तक लाने का समय नहीं मिला। नेट पर रोजाना घंटो बीतते रहे, कभी-कभार मन भी किया कि कुछ लिखूं लेकिन फिर ना जाने क्यूं की-बोर्ड पर हाथ ही नहीं चले।
आज मेरे एक साथी ने एक सुझाव दिया, जो दिल करे उसे ब्लॉग पर लिख डालो। हां, शायद ब्लॉग का मतलब भी तो यही है, जो दिल में आए, जो अच्छा लगे, जो ना अच्छा लगे, सब यहां उतार दो। हम आजाद हैं, अपनी खुशी, अपने गम, अपने विचार को दुनिया के सामने रखने के लिए। तो आज से एक नई शुरुआत, झरोखा मेरे मन के साथ,,,,,,,,,
आज के लिए फिलहाल इतना ही बहुत जल्दझ फिर मुलाकात होगी।
आज मेरे एक साथी ने एक सुझाव दिया, जो दिल करे उसे ब्लॉग पर लिख डालो। हां, शायद ब्लॉग का मतलब भी तो यही है, जो दिल में आए, जो अच्छा लगे, जो ना अच्छा लगे, सब यहां उतार दो। हम आजाद हैं, अपनी खुशी, अपने गम, अपने विचार को दुनिया के सामने रखने के लिए। तो आज से एक नई शुरुआत, झरोखा मेरे मन के साथ,,,,,,,,,
आज के लिए फिलहाल इतना ही बहुत जल्दझ फिर मुलाकात होगी।
शनिवार, 27 मार्च 2010
जरा आराम से वरना………..
बड़े- बडे़ क्रिमिनल्स और घूसखोरों को घुटने टेकने पर मजबूर करने वाले रिपोर्टर और सब-एडिटर्स आज कल जब तब जमीन पर नजर आ रहें हैं। ये सिलसिला सिर्फ इन्ही तक सीमित नहीं है, इसमें आिफस का एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ भी शामिल है। 1 मिनट आप कुछ और तो नहीं सोच रहे, अगर सोच रहें तो अपने दिमाग को थोड़ा विराम दें और आंखो को आगे के मैटर पर दौड़ाए।
हुआ यूं कि तीन साल आिफस का बोझ उठा रहीं वहां की कुर्सियां अब जवाब देने लगीं हैं। उस पर भी लोगों को उन पर रहम नहीं आता पूरे दिन का गुस्सा बेचारी उन कुर्सियां पर उतारा जाता है। आए और पूरे जोश के साथ खुद को उन बेचारी कुर्सियों पर दे मारा। आखिर वे ये सब कब तक सहती सो उन्होनें भी सबक सिखाना शुरू कर दिया। कभी इसको पटकती हैं तो कभी उसको लेकिन फर भी ना लोगों का जोश कम हो रहा है और ना लोगों का आए दिन लोगों का गिरना। समझो उन बेचारी कुर्सियों की पीढ़ा को क्योंकि अगर अभी-भी नहीं समझे तो वे आपको पीढ़ा देने लगेंगी।
धन्यवाद !
सोमवार, 29 जून 2009
जींस पर सरकार की मोहर

भारत एक लोकतांत्रिक देश है. यहाँ सभी को सामान अधिकार है,चाहे वह लड़की, लड़का या किसी भी धर्म जाती का हो.लेकिन हमारे समाज में लड़कियों को हमेशा उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है.कालेज में छात्राओ के लिए ड्रेश कोड लागू करके उनके अधिकारों का हनन किया गया है .इस प्रकरण ने लोकतंत्र की छवि को धूमिल किया है.हालाँकि सरकार ने ड्रेश कोड नियम को हटते हुए,समाज के ठेकेदारों को जो चेतावनी दी है वह कबीले तारीफ है.छात्राओ को सुरक्षा प्रदान करने के लिए उन्हें ड्रेश कोड तथा घरो में कैद करना,हमारे समाज तथा कानून व्यवस्था की नपुंसकता की देन है.समाज में महिलाओ की सुरक्षा की स्थिति आज भी बहुत कमजोर है .
आज हम संसद में महिलाओ को रिज़र्वेशन तथा समाज में बराबरी का दर्जा देने की बात कर रहे है.लेकिन आज भी हमारे समाज में ऐसे लोग है, जो सामंतवादी विचारधारा की जंजीरों में जकडे हुए हैं,और महिलाओ को घर की दहलीज तक ही सीमित रखना चाहते हैं.ऐसे ही लोग समाज में शिष्टाचार एवं मर्यदा बनाए रखने की जिम्मेदारी महिलाओ पर थोपते हैं .बलात्कार जैसे मामलो में दोष भले ही पुरुष का हो इज्जत महिला की ही जाती है,क्यों? गौरतलब है की हमारा शब्दकोष ही महिलाओ के विरूद्ध है. आज भी घर पर जब कोई महिला आकेली होती है,और घर के बहार कोई अजनबी आवाज लगता है ,तो उसका जवाब होता है "घर पर कोई है नही बाद में आना " क्या उस महिला का कोई अस्तित्व नही?जो घर पर होते हुए भी कहती है कोई नही है .
बात बहुत छोटी है लेकिन सचाने वाली है . महिलाओ को बचपन से ही अनगिनत नियमो और मर्यादाओ में बांध दिया जाता है,और इन्ही नियमो और मर्यादाओ को निभाते -निभाते वो खुद को भी भुला देती है .जीवन भर बलिदान देने वाली नारी को हमारा समाज क्या दे रहा है ?
आज हम संसद में महिलाओ को रिज़र्वेशन तथा समाज में बराबरी का दर्जा देने की बात कर रहे है.लेकिन आज भी हमारे समाज में ऐसे लोग है, जो सामंतवादी विचारधारा की जंजीरों में जकडे हुए हैं,और महिलाओ को घर की दहलीज तक ही सीमित रखना चाहते हैं.ऐसे ही लोग समाज में शिष्टाचार एवं मर्यदा बनाए रखने की जिम्मेदारी महिलाओ पर थोपते हैं .बलात्कार जैसे मामलो में दोष भले ही पुरुष का हो इज्जत महिला की ही जाती है,क्यों? गौरतलब है की हमारा शब्दकोष ही महिलाओ के विरूद्ध है. आज भी घर पर जब कोई महिला आकेली होती है,और घर के बहार कोई अजनबी आवाज लगता है ,तो उसका जवाब होता है "घर पर कोई है नही बाद में आना " क्या उस महिला का कोई अस्तित्व नही?जो घर पर होते हुए भी कहती है कोई नही है .
बात बहुत छोटी है लेकिन सचाने वाली है . महिलाओ को बचपन से ही अनगिनत नियमो और मर्यादाओ में बांध दिया जाता है,और इन्ही नियमो और मर्यादाओ को निभाते -निभाते वो खुद को भी भुला देती है .जीवन भर बलिदान देने वाली नारी को हमारा समाज क्या दे रहा है ?
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